कुछ कही अनकही
आज फिर वो सोच रही थी कि काश वो वक़्त थम जाता और वो भी अपने मन की बात कह जाती। आज उस अनकही बात के दर्द ने तृषा के जीवन को गहराई तक झकझोर दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो बिखेर दिया ।अपने वर्तमान को भूल, इससे पहले कि वो अतीत के कुछ और पन्नो को पलट पाती यथार्थ ने उसे बाहों में ले लिया।
कितना अपनापन था उसके स्पर्श में, कितना कोमल ,सुखद अहसास था उसके अपनत्व का। तृषा चाहकर भी खुद को इस मोहजाल से अलग नहीं कर पाई थी लेकिन आज की इस घटना ने उसके भूत को वर्तमान से जोड़ दिया था। ये कैसी दशा हो गई थी उसकी। वो क्या करे , क्या न करे उसकी समझ से परे होने लगा। 6 साल पुरानी जिन यादों को वो भुला बैठी थी ,आज वो उसके वर्तमान को चोट पहुँचा रही थी और हैरत की बात तो यह थी कि खुद तृषा इन सबसे बेख़बर सी लग रही थी।
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